सुभद्रा कुमारी चौहान की जयंती पर विशेष आलेख
बुंदेले हरबोलों के मुँह, हमने सुनी कहानी थी। ख़ूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। इन ओज की पंक्तियों के माध्यम से झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान को अमर कर देने वाली सुभद्राकुमारी चौहान की आज जन्मतिथि है। उनका काव्य राष्ट्रभक्ति के साथ साथ पंथनिरपेक्षता, सर्वधर्मसमभाव और भारतीय संस्कृति की सर्वसमावेशी प्रवृत्ति की अनूठी मिसाल है, झांसी की रानी की वीरता का बखान करते हुए वे कहती हैं- सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी। वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। ...