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नेताजी को सच्ची श्रद्धांजलि है फिल्म समाधि

 #समाधि #NetajiSubhashChandraBose #NetajiJayanti #Netaji #NetajiBirthday #नेताजी  कल भारत माता के महान सपूत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी की 125वीं जयन्ती सम्पूर्ण कृतज्ञ राष्ट्र ने धूमधाम से मनाई। कल रात मुझे यूट्यूब पर नेताजी के महान संग्राम पर आधारित सन 1950 की रमेश सहगल द्वारा फिल्मिस्तान स्टूडियो के लिए निर्मित फिल्म समाधि देखने का अवसर मिला। नेताजी के गुम होने के चार साल के अंदर और देश को आजाद होने के दो साल बाद ही बनी यह फिल्म दर्शाती है कि तत्कालीन भारत के लोगों में नेताजी और आज़ाद हिंद फौज के लिए कितना सम्मान था। यह फिल्म नेताजी के सिंगापुर जाने से शुरू होती है और मई 1944 में आज़ाद हिंद फौज के बहादुर सैनिकों द्वारा जापानी सेना के साथ मिलकर कोहिमा को जीत लेने की घटना पर आधारित है। यह सन 1950 की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म थी और पूरे देश में दर्शकों ने इस युद्ध आधारित फिल्म को अपना भरपूर प्यार दिया था, लेकिन दुर्भाग्य का विषय है कि आज के फिल्म प्रशंसक इस फिल्म के विषय में बहुत कम जानते हैं। अशोक कुमार, नलिनी जयवंत, कुलदीप कौर, श्याम, मुबारक, शशि कपूर, डेविड और कोलिन ने ...

वीरवर सरदार भगत सिंह की प्रशस्ति का अनुपमेय राग

 मित्रवर संजय मिश्र 'रजोल' जी मेरे बाल्यकाल के अग्रज और मित्र हैं। विभिन्न साहित्यिक मंचों पर मैंने बचपन से उन्हें काव्य पाठ करते हुए देखा है और उनकी कविताओं से प्रभावित रहा हूं। विगत दिनों उन्होंने अपने प्रबन्ध काव्य 'क्रांतिवीर सरदार भगत सिंह' की भूमिका लिखने का अनुरोध किया तो मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई कि एक श्रेष्ठ कवि के कविता कौशल का मुझे जौहरी बनने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। इस अनुपमेय ग्रंथ की जो भूमिका मैंने 'वीरवर सरदार भगत सिंह की प्रशस्ति का अनुपमेय राग' शीर्षक से लिखी है, वह आप सभी पाठकों मित्रों के लिए प्रस्तुत है। आप स्वयं ऐसे काव्य श्रेष्ठि की काव्यात्मक उत्कृष्टता के कतिपय उदाहरण देख सकते हैं - वीरवर सरदार भगत सिंह की प्रशस्ति का अनुपमेय राग भारतीय काव्यशास्त्रीय आचार्यों ने काव्य के प्रयोजनों को स्पष्ट करते हुए समाज को सार्थक दिशा में अग्रसर करना काव्य का अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रयोजन माना है| गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में कविता के विषय में ‘कीरति भनिति भूति भलि सोई, सुरसरि सम सब कहँ हित होई’ कहकर कविता को माँ गंगा की तरह सभी के ...

चूजे जैसा दिखने वाला चीन और उसकी मक्कारियां

 विश्व में कोरोना फैलाने, भारत, ताइवान, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस आदि देशों से सीमा विवाद पैदा करने और कृत्रिम सूरज का निर्माण कर पर्यावरण को तहस नहस करने की दुरभि संधि करने के बाद दुष्ट चीन अब ह्यूमांजी अर्थात् मनुष्य और चिम्पांजी के संयोग से बना नरपशु निर्मित करने की फिराक़ में है। 60 के दशक में रूस इसका असफल प्रयास कर चुका है।पुरुष शुक्राणु को मादा चिंपांजी के शरीर में प्रविष्ट कराकर कृत्रिम गर्भाधान के द्वारा वह इन्हें तैयार करना चाहता है। गलवान घाटी में भारतीय बहादुरों के शौर्य के सामने चीनी चूजों ने जिस तरह घुटने टेके, वह किसी से अब छुपा नहीं है, लेकिन ह्यूमांजी बनाकर वह इन्हें कृत्रिम बुद्धिमत्ता से युक्त कर सैनिक के रूप में भी इनका प्रयोग कर सकता है, जो वास्तव में भारत ही नहीं बल्कि समूची दुनिया के लिए चिंता की बात है। © डॉ पुनीत बिसारिया

हिन्दी शिक्षण के लिए सिनेमा सशक्त माध्यम बन सकता है

 वर्तमन युग प्रौद्योगिकीय विकास का है, जिसमें जीवन के समस्त क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा रहा है और मानव जीवन को सहज, आसान और सुरक्षित बनाया जा रहा है। बीते दशकों में प्रौद्योगिकीय सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण महामारियों के दौर में दुनिया लाशों से पट जाया करती थी और शिक्षा व्यवस्था पूर्णतः ध्वस्त हो जाया करती थी, लेकिन इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में उपस्थित कोविड 19 महामारी के इस दौर में प्रौद्योगिकीय विकास के कारण दुनिया ने अपने समस्त कार्यकलाप अपेक्षाकृत अधिक सुगमता से किए हैं। हमने यह देखा है कि भारत सहित दुनिया के सभी देशों में सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जनसंचार के विभिन्न साधन जैसे मोबाइल इंटरनेट टीवी रेडियो आदि के माध्यम से इस महामारी से हुई क्षति को न्यूनतम रखने में हमें सहायता मिली है। एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि कोविड महामारी के दौरान ऑनलाइन माध्यमों से विभिन्न ऐप के द्वारा तथा अनेक सैटेलाइट एवं यूट्यूब चैनलों के द्वारा और फेसबुक लाइव आदि के माध्यम से हमने आभासी मंचों का उपयोग कर अध्ययन और अध्यापन कार्य को बाधित नहीं होने...

हिन्दी का भविष्य स्वर्णिम है

 हिन्दी का संघर्ष नामक एक पुस्तक के लिए डॉ हेमा जोशी जी ने मेरा साक्षात्कार लिया था। प्रस्तुत है इस साक्षात्कार की अविकल प्रस्तुति ~ प्रश्न 1) आज हिंदी क्षेत्र का जनमानस हिंदी को लेकर कितना उद्वेलित है? उसे राष्ट्रीय संदर्भों में हिंदी की किस भूमिका की अपेक्षा है? उत्तर 1) हिंदी पट्टी का जनमानस   प्रायः छोटे-छोटे गांवों, कस्बों और शहरों में रहता है, वह महानगरों की चाकचिक्य से दूर रहकर हिंदी पढ़ता, लिखता और बोलता है और दुखद सच यह है कि अभी तक भाषाई दृष्टि से शासकीय नीति निर्धारण में उसकी भूमिका नगण्यप्राय थी और तथाकथित अंग्रेज़ीपरस्त अंग्रेजदां सिविल सेवक मनमानी नीतियां बनाकर हिंदी और भारतीय भाषाओं को हाशिए पर रखने का कुचक्र रच रहे थे। सौभाग्य से आज देश को नरेन्द्र मोदी के रूप में एक नितांत हिंदीप्रेमी प्रधानमंत्री एवं शिक्षा मंत्री के रूप में कवि ह्रदय हिंदीनिष्ठ डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों को पर्याप्त महत्त्व देते हुए इसके 22वें अनुच्छेद को भाषाई अस्मिता के लिए समर्पित किया है। ...

सर्दी पर कुछ रचनाएं

 ऋतु परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इसी क्रम में शीत ऋतु ने अब अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया है। ऐसे में याद आते हैं शीत ऋतु वर्णन से जुड़ी साहित्यिक कविताएं एवं फिल्मी गीत, इनके कुछ अंश प्रस्तुत हैं~ जायसी के पद्मावत के पद्मावती समय से उद्धृत बारहमासा का पौष ऋतु वर्णन~~ पूस जाड़ थर थर तन काँपा। सुरुजु जाइ लंका दिशि चाँपा।। बिरह बाढ़ दारुन भा सीऊ। कँपि कँपि मरौं ,लेइ हरि जीऊ।। कंत कहाँ लागौं ओहि हियरे। पंथ अपार , सूझ नहिं नियरे।। सौर सपेती आवै जूड़ी। जानहु सेज हिवंचल बूड़ी।। चकई निसि बिछुरै दिन मिला हौं दिन राति बिरह कोकिला।। रैनि अकेलि साथ नहिं सखी। कैसे जियै बिछोही पंखी।। बिरह सचान भएउ तन जाड़ा। जियत खाइ औ मुये न छाँड़ा।। रकत ढुरा माँसू गरा , हाड़ भएउ सब संख। धनि सारस होइ ररि मुई ,पीऊ समेटहिं पंख।। ●● राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के साकेत के नवम सर्ग से~~ यदपि काल है काल अन्त में, उष्ण रहे चाहे वह शीत, आया सखि हेमन्त दया कर देख हमें सन्तप्त-सभीत। आगत का स्वागत समुचित है, पर क्या आँसू लेकर? प्रिय होते तो लेती उसको मैं घी-गुड़ दे देकर। पाक और पकवान रहें, पर गया स्वाद का अवसर बीत, ...

प्रतिभा के ज्योतिपुंज शैलेन्द्र

 'कविराज शैलेन्द्र' की जयंती के अवसर पर प्रस्तुत है मेरा लेख 'प्रतिभा के ज्योति पुंज शैलेन्द्र ' जिसे मैंने डॉ इन्द्रजीत सिंह द्वारा सम्पादित पुस्तक 'धरती कहे पुकार के' हेतु लिखा था, किन्तु उक्त पुस्तक में पूरा लेख नहीं छप सका था| फेसबुक के मेरे मित्रों के लिए प्रस्तुत है यह अविकल लेख ~~ प्रतिभा के ज्योतिपुंज शैलेन्द्र गीतों  के  जादूगर  का   मैं  छंदों  से  तर्पण    करता    हूँ, सच    बतलाऊँ     तुम    प्रतिभा    के    ज्योतिपुंज    थे|  X      X      X      X जहाँ  कहीं  भी अंतर मन से, ऋतुओं  की सरगम बुनते थे, ताजे  कोमल  शब्दों  से, तुम  रेशम  की  जाली  बुनते थे| X      X      X      X प्रिय  भाई  शैलेन्द्र,  तुम्हारी  पंक्ति पंक्ति नभ में  लहराई, तिकड़म  अलग  रही  मुस्काती...

गुंजन सक्सेना

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  गुंजन सक्सेना नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई फ़िल्म है, जो शौर्य चक्र विजेता कारगिल गर्ल के नाम से विख्यात फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना की बायोपिक है। गुंजन सक्सेना ने लखनऊ में कर्नल अनूप सक्सेना के घर जन्म लिया और हंसराज कॉलेज, दिल्ली से बीएससी करने के बाद भारतीय वायु सेना में भर्ती होने वाली पहली भारतीय महिला पायलट थीं। उन्होंने साथी महिला पायलट श्रीविद्या राजन के साथ मिलकर सन 1999 के कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सैनिकों की युद्ध में तैनाती की निगरानी की थी और 40 से अधिक बार युद्धग्रस्त क्षेत्र में जाकर 900 से अधिक घायल एवं शहीद सैनिकों को भारतीय क्षेत्र में वापस लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। वह उन प्रथम 25 महिला पायलट में शामिल थीं जिन्हें भारतीय वायु सेना के इतिहास में पहली बार कमीशन किया गया था। उन्होंने सन 2004 तक सेवाएं दी थीं। गुंजन सक्सेना फ़िल्म उनके अपरिमित शौर्य पर आधारित है। गुंजन सक्सेना फ़िल्म में मुख्य पात्र की भूमिका जान्हवी कपूर ने निभाई है, उनके पिता की भूमिका पंकज त्रिपाठी ने निभाई है और इन दोनों ने अपनी भूमिका को बखूबी निभाया है। इनके अतिरिक्त मानव विज, अंगद...

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की हिन्दी दृष्टि

यह शत प्रतिशत सत्य है कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की साहित्यिक दृष्टि को समझे बगैर हिन्दी साहित्य को समझ पाना आज भी आकाश कुसुम जैसा है। उनकी स्थापनाओं से टकराए बगैर न तो समीक्षक आगे बढ़ सकते हैं और न ही उन्हें हृदयंगम किए बिना साहित्यिक पाठक हिन्दी साहित्य के विकासक्रम तथा कवि-लेखकों के विषय में अपना मन्तव्य स्थापित कर सकते हैं। एक बहुज्ञ विद्वान के रूप में उनकी स्थापनाएँ भारतीय दृष्टि तथा पाश्चात्य पथ के मध्य स्थित गलियारे पर सरपट दौड़ती हैं एवं भारतीयता के पक्ष को पुष्ट करती नज़र आती हैं। एतदर्थ, भारतीयता के आग्रही होने के परिणामस्वरूप स्वाभाविक तौर पर भाषा की दृष्टि से भी आचार्य शुक्ल हिन्दी के प्रबल पक्षधर के रूप में खड़े दिखाई देते हैं। नागरी प्रचारणी सभा ने जिस समय काशी से ‘हिन्दी’ मासिक पत्र निकालने की योजना बनायी, उस समय सम्भवतः इस पत्र के पीछे आचार्य शुक्ल की ही प्रेरणा काम कर रही थी क्योंकि उस समय आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ही सभा के सभापति थे। इस पत्र को निकालने हेतु उन्होंने सभापति के रूप में ‘हिन्दी प्रेमियों से अनुरोध’ शीर्षक से एक पत्र लिखा था, जिससे उनकी हिन्दी के प्रति भावना देख...