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किन्नर विमर्श : समाज के परित्यक्त वर्ग की व्यथा कथा

किन्नर विमर्श : समाज के परित्यक्त वर्ग की व्यथा कथा             डॉ पुनीत बिसारिया जब कभी किसी के परिवार में कोई खुशी का अवसर होता है, तो हम देखते हैं कि एक लैंगिक दृष्टि से विवादित समाज के लोग जो प्रायः हिजड़े (अथवा वर्तमान में प्रचलित नाम किन्नर; हालाँकि किन्नर शब्द हिमाचल प्रदेश के किन्नौर निवासियों हेतु प्रयुक्त होता था, जिसे अब हिजड़ों के सन्दर्भ में व्यवहृत किया जाने लगा है) होते हैं, आ जाते हैं और बधाइयाँ गाकर, आशीर्वाद देकर कुछ रुपए लेकर विदा हो जाते हैं. इसके बाद हम भी अपनी सामान्य गतिविधियों में व्यस्त हो जाते हैं और दोबारा कभी इनके बारे में नहीं सोचते. हम कभी यह जानने का प्रयास नहीं करते कि ये किन्नर कौन हैं, कहाँ से आये हैं, इनकी समस्याएँ क्या हैं और वे कौन से कारण हैं, जिनकी वजह से इन्हें किन्नर बनकर एक प्रकार की भिक्षावृत्ति से जीवन-यापन करने को विवश होना पड़ता है.             किन्नर या हिजड़ों से अभिप्राय उन लोगों से है , जिनके जननांग पूरी तरह विकसि...

इक्कीसवीं शताब्दी में हिन्दी का भविष्य

नवें दशक के प्रारम्भ में उदारीकरण, निजीकरण तथा भूमंडलीकरण (एलपीजी) के आगमन के साथ ही समाजशास्त्रीय चिंतक हिन्दी का मर्सिया पढ़ने लगे थे किन्तु इसके विपरीत ये पिछले दो दशक हिन्दी की वैश्विक स्वीकृति का खुशनुमा माहौल लेकर आये हैं. करिश्माई बॉलीवुड का सिनेमा, विश्व भर में फैले प्रवासी भारतीयों का हिन्दी प्रेम, योग की वैश्विक स्वीकृति, भारतीय अध्यात्म एवं दर्शन के प्रति विदेशियों में बढ़ रहा अनुराग तथा दुनिया के अनेक देशों में सफलतापूर्वक आयोजित हुए विश्व हिन्दी सम्मेलनों ने विश्व का हिन्दी के प्रति ध्यान आकर्षित किया है और अब विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भी हिंदीभाषियों तथा हिन्दी की अपने-अपने देशों में अपरिहार्यता को महसूस करने लगे हैं.यह अनायास नहीं कि ब्रिटेन के आम चुनाव को जीतने के लिए डेविड कैमरन को ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘अबकी बार कैमरन सरकार’ जैसे विशुद्ध हिन्दी के नारे गढ़ने पड़ते हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति को भारतीय पर्वों को मनाने हेतु आगे आना पड़ता है और हिन्दी में भाषण देकर अपनी हिन्दी अनुरक्ति का परिचय देना पड़ता है. दुनिया के पाँचों महाद्वीपों के लगभग सभी प्रमुख राजनेताओं को भारत औ...

आखिर इस मर्ज की दवा क्या है ?

आखिर इस मर्ज की दवा क्या है ? विश्व युद्ध की मौतों और देशों के आपसी युद्धों को छोड़ दें तो इक्कीसवीं शताब्दी अब तक की सबसे रक्तरंजित शताब्दी होने जा रही है। हमने सोचा था कि पढ़-लिखकर हम कुछ अधिक मानवीय, अधिक सभ्य, अधिक उदार और अधिक विश्व नागरिक बनेंगे लेकिन बीते कुछ समय से देखा जा रहा है कि तथाकथित पढ़े-लिखे लोग अधिक कट्टर, अधिक धर्मांध और अधिक संख्या में आतंकी बन रहे हैं। आखिरकार कमी कहाँ है? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका उत्तर सम्पूर्ण मानवजाति को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए खोजना ही होगा। आइसिस का बकर अल बगदादी बगदाद यूनिवर्सिटी से पी-एच. डी. है, नक्सलवादियों के समर्थक कुछ दिग्भ्रमित प्रोफेसर और तथाकथित बुद्धिजीवी हैं, कश्मीर की हिंेसा को जायज ठहराने वाले भी कुछ तथाकथित पढ़े-लिखे प्रभु वर्ग के प्रशांत भूषण टाइप के लोग हैं। हाइड्रोजन बम के परीक्षण से समूची दुनिया की शान्ति को भंग करने वाला उत्तर कोरिया का बददिमाग तानाशाह किम जोंग उन भी काफी पढ़ा लिखा माना जाता है। दुनिया के किसी भी कोने में घटने वाली किसी भी घटना का संचार क्रान्ति के युग में बेहद गहरा और अचूक प्रभाव पड़ता है, राजन...

'कलाम को सलाम' कविता संग्रह में मेरे द्वारा लिखित दो शब्द

भारत रत्न पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम का विगत 27 जुलाई सन 2015 को निधन हो गया था. उन्हें श्रद्धान्जलि देते हुए देश के 101 कवियों ने उन पर कविताएँ लिखी थीं, जिनका संग्रह मेरे तथा विनोद पासी हंसकमल के संयुक्त संपादन में  'कलाम को सलाम' शीर्षक से सुभांजलि प्रकाशन, कानपुर से प्रकाशित हो रहा है. यह संग्रह मकर संक्रांति 15 जनवरी सन 2016 तक आपके बीच होगा. पेश है, इस संग्रह में मेरे द्वारा लिखे गए दो  शब्द कविता दिल से उठते उच्छ्वासों का प्रकटीकरण है. ये उच्छ्वास तभी उठते हैं, जब कोई घटना, विचार, अनुभव या परिस्थिति हमारे मन को आंदोलित करती है. मन में उमड़-घुमड़कर ये उच्छ्वास बवंडर का रूप ले लेते हैं और कलम से कागज़ पर उभरकर कविता का रूप ले लेते हैं. किसी कवि की कविता क्रौंच पक्षी के विलाप (वाल्मीकि) से अभिव्यक्त हो सकती है, पत्नी रत्नावली की प्रताड़ना (तुलसीदास) से जन्म ले सकती है, चांदनी रात में गंगा नदी में नौका विहार (सुमित्रानंदन पन्त) से उत्थित हो सकती है, हिरोशिमा के भग्नावशेषों को निरखकर (अज्ञेय) आ सकती है या फिर किसी निर्भया पर अत्याचार (विगत तीन वर्षों में अनेक कविय...

ये तो हमारी संस्कृति नहीं !!!!

इस देश में शास्त्रार्थ की अत्यंत स्वस्थ परम्परा रही है। विभिन्न सम्प्रदायों के बीच स्वस्थ बहस से भारतीय मनीषा ने अपने ज्ञान को विस्तृत किया है। परस्पर विरोधी अवधारणाएं एक ही समय में न सिर्फ रहीं बल्कि उन्होंने एक दूसरे को प्रभावित करने का काम भी किया। दक्षिण की द्रविड़ संस्कृति की  आराधना पद्धति आर्य परम्परा में ऐसी घुल मिल गयी कि कोई यह कह ही नहीं सकता कि यह पद्धति हमारे क्षेत्र की नहीं है। क्या आज कोई विश्वास के साथ बता सकता है कि हममें से आर्य, शक, हूण, यक्ष, नाग, कोल, किरात जाति का कौन है। ये सब हममें घुलमिल गईं। हमने वेद को स्वीकारा तो उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप रचे उपनिषद को भी स्वीकारा। तुलसी हमारे हैं तो कबीर भी हमारे हैं, सूफी भी हमारे अपने हैं। हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिक्ख, मुसलमान, यहूदी, पारसी, ईसाई सबको हमने उनके आराधना पद्धति और धर्म के साथ अपनाया लेकिन अंग्रेजों के आने के बाद से हमारी सहिष्णुता में कमी आयी, जिसके परिणामस्वरूप देश के कई टुकड़े हुए और बर्मा, अफगानिस्तान, भूटान, नेपाल तथा तिब्बत को चुपचाप हमसे अलग करने के बाद जाते-जाते वे पाकिस्तान बनाकर कभी न भरने वाला ज़ख्...

कलिकथा वाया बाइपास के बहाने समाज की पड़ताल

यह लेख अलका सरावगी के उपन्यास कलि कथा वाया बायपास उपन्यास की संकरी कलकतिया गलियों से गुजरकर भारतीय समाज के परिवर्तनों की आहट को महसूसता है. जिस दौर में ‘कलि कथा वाया बाइपास’ लिखा गया, वह दौर भूमंडलीकरण की आहट के कोलाहल में डूबा हुआ था. उस दौर में हर बुद्धिजीवी अपने-अपने ढंग से इसको परिभाषित कर रहा था और इसके सामाजिक प्रभावों की पड़ताल कर रहा था. यह उपन्यास भी भूमंडलीकृत समाज में सामाजिक व्यवस्था से अजनबीपन की हद तक कटे हुए किशोर बाबू की कहानी है, जिनके दिल की बाइपास सर्जरी क्या हुई, उनका चीज़ों को देखने का नजरिया ही बदल गया. जो किशोर बाबू मध्यमवर्गीय मानसिकता के अनुरूप अनेक प्रकरणों को बाइपास कर जाने की मानसिकता रखते थे, दिल की सर्जरी के बाद बार-बार उन गलियों में चले जाते हैं, जिनसे वे कभी गुजरकर आये थे. उनकी यह यात्रा उन्हें अपने पुरखों के जीवन से 1 जनवरी सन 2000 तक की यात्रा पर ले जाती है, जिसमें प्रसंगानुसार इतिहास की घटनाएं भी चहलकदमी करती रहती हैं. यह कथा वस्तुतः डेढ़ सौ साल के रूढ़िवादी मारवाड़ी समाज की कथा ही नहीं है, वरन इसमें भारतीय समाज की विसंगतियों की जड़ें देखी जा सकती हैं. ...

पुरुष भावनाओं की अभिव्यक्ति है यायावर

आजकल साहित्य में स्त्री विमर्श की बड़ी धूम है. स्त्रियों के अधिकारों, उनकी व्यथाओं एवं पीड़ा के आख्यानों की चर्चा से साहित्य गुंजायमान है. परन्तु पुरुष की भावनाएँ, उसकी अपेक्षाएँ तथा ज़रूरतें साहित्य से प्रायः बहिष्कृत हैं. इसका कारण यह दिया जाता है कि सदियों से पुरुष ने स्त्रियों पर अत्याचार किए हैं और स्त्री ने उन अत्याचारों को मौन होकर सहा है, इसलिए स्त्री की पीड़ा का बखान ज़रूरी है. यह बात सच भी है लेकिन क्या इसी आधार पर पुरुष की वेदना के आख्यानों को साहित्य से देशनिकाला दे दिया जाना चाहिए और उसकी आवाज़ का गला घोंट दिया जाना चाहिए? मेरे विचार से ऐसा करना समस्या को एकांगी दृष्टिकोण से देखना होगा.       हिन्दी साहित्य में बहुत कम ऐसे लेखक हैं, जिन्होंने पुरुषों की पीड़ा पर अपनी कलम चलाई है. आचार्य निशांतकेतु के बाद यदि किसी लेखक का नाम जेहन में आता है तो वह हैं चन्द्र विजय प्रसाद ‘चन्दन’ जी. चन्दन जी इससे पहले ‘लौट आओ सिम्मी’ उपन्यास के माध्यम से एक किशोर प्रेमी की कोमल अनुभूतियों एवं निश्छल प्रेम की अभिव्यक्ति कर चुके हैं. समीक्ष्य ‘यायावर’ लघु उपन्यास के माध्...