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अम्बेडकर की अंतर्वेदना पुस्तक की समीक्षा

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डॉ राम भरोसे हरिद्वार में हिन्दी के प्राध्यापक हैं. आपने मेरी पुस्तक अम्बेडकर की अंतर्वेदना की समीक्षा लिखी है . पेश है समीक्षा आप मित्रों के लिए --- ***आजकल बाबा साहेब से सम्बंधित अति महत्वपूर्ण पुस्तक पढ़ रहा हूँ. जिसका शीर्षक है ‘अम्बेडकर की अंतर्वेदना’ और इसके लेखक द्वय हैं शेषराव चव्हाण जी व डॉ. पुनीत बिसारिया जी. इस पुस्तक की प्रति मेरे आग्रह पर स्वयं मेरे मित्र-लेखक डॉ. पुनीत जी ने उपलब्ध कराई. अभी इस पुस्तक का कुछ अंश पढ़ना शेष है. परन्तु जितना भी इस पुस्तक को पढ़ पाया हूँ यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं हो रही है कि अम्बेडकर को मानने और समझने वालों को यह पुस्तक अनिवार्य रूप से पढनी चाहिए. बल्कि निश्चित ही बौद्ध धर्म को भी काफी हद तक समझने में इस पुस्तक से मदद मिलेगी. अंतिम समय में बाबा साहेब की मन की व्यथा, छटपटाहट-पीड़ा के मुख्य कारण क्या रहे.? आखिर क्या कारण था कि अपने अंतिम समय में उन्हें कहना पड़ा “मैं अपने समाज के पढ़े-लिखे लोगों से सर्वाधिक निराश हूँ और अब मेरी आशा का केंद्र बिंदु अशिक्षित लोग हैं.’’ इन्ही सच्चाई और गहराइयों की पड़ताल करती है यह पुस्तक. इस सच को मानने में भी...

यादे फैज़ाबाद .

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फैज़ का अरबी में अर्थ है विजेता और सफल लेकिन फैज़ाबाद शहर का दुर्भाग्य है कि न तो यह नाम के मुताबिक विजेता है और न ही सफल. अवध के पहले नवाब सआदत  अली खां ने सन 1730  में जब यह शहर बसाया और इसे अपनी राजधानी बनाया था, तब शायद उन्होंने सोचा होगा कि ये शहर अपने नाम के अनुरूप सफल विजेताओं का शहर साबित होगा लेकिन वे खुद बहुत कम समय यहाँ रह सके.करनाल के युद्ध में नादिरशाह के खिलाफ मुगलों की ओर से लड़ते हुए वे 19 मार्च सन 1739 को मारे गए;  अवध के दूसरे नवाब सफदरजंग के बाद तीसरे नवाब शुजाउद्दौला के जमाने में इस शहर ने भव्यता की पराकाष्ठा को छुआ. किला, गुलाबबाड़ी, मोतीमहल, बहू बेगम का मक़बरा जैसीअवध की शान कही जाने वाली इमारतें उसी के दौर में बनीं. उनके सलाहकार दराब अली खां ने सन 1816 में उनकी बेगम की मृत्यु के पश्चात् तीन लाख रूपए की लागत से उनका मक़बरा बनवाया जो अवध की स्थापत्य कला का श्रेष्ठ नमूना है. अवध के चौथे नवाब आसफुद्दौला ने यदि सन 1775 में अवध की राजधानी को फैज़ाबाद से लखनऊ न शिफ्ट किया होता तो कौन जाने आज उत्तर प्रदेश की राजधानी फैज़ाबाद होती. ...

साहित्येतिहास के काल विभाजन के नामकरण का एक लघु प्रयास

एक इतिहास यह भी  साहित्येतिहास एक ऐसा विषय रहा है, जो प्रत्येक दौर में आलोचकों को चुनौती देता रहा है क्योंकि साहित्येतिहास न तो कभी खत्म हो सकता है और न ही इसे कोई अंतिम रूप से लिख सकता है। साहित्येतिहास लेखन करते समय समकालीन साहित्य हमारे लिए एक बड़ी मुश्किल खड़ी करता है और प्राचीन साहित्य के क्षेत्र में नवीनतम अनुसंधान से प्राप्त तथ्य पूर्ववर्ती साहित्य के इतिहास लेखन के रास्ते में नए पग चिह्न बना देते हैं, जिनकी उपेक्षा करना मुमकिन नहीं होता। नवीनतम सांस्कृतिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, आर्थिक एवं सामाजिक घटनाक्रम साहित्य पर अपने तीखे निशान छोड़ जाते हैं, जिनकी पहचान करना साहित्येतिहास लेखक की बुद्धिमत्ता की कसौटी होता है। इसके अतिरिक्त साहित्येतिहास लेखन की परंपरा और नवीनतम साहित्य के अद्यतन स्वरूपों का ज्ञान भी एक बड़ा प्रश्न है जिससे मुक्त नहीं हुआ जा सकता। साहित्य के इतिहास को नए विमर्शों से जोड़ने के लिए शुक्ल जी के इतिहास से बाहर आना आवश्यक है, लेकिन दुर्भाग्यवश आज एक भी ऐसा समीक्षक नहीं दीखता, जो इस चुनौती को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ने का साहस कर सके। साहित्येतिहास लेखन गहन...

अप्रिय सवालों से जूझती पुरुषोत्तम अग्रवाल की कहानी नाकोहस

पुरुषोत्तम अग्रवाल की ख्याति एक आलोचक के तौर पर है। पाखी  में उनकी कहानी नाकोहस प्रकाशित हुई है। जब मैंने इस कहानी को पढ़ा तो मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि इस कहानी के माध्यम से एक आलोचक यह बताना चाहता है कि एक कथाकार को कैसे कहानी लिखनी चाहिए और वर्तमान समय के वे कौन से हौलनाक सच हैं, जिन्हें आज की कहानी में गढ़ा और मढ़ा जाना चाहिए। एक कलात्मक औदात्य के बोझ से लहूलुहान यह कहानी उत्तर आधुनिक समाज की गप्प गोष्ठियों, मिथकीय अंतर्द्वंद्वों तथा सांप्रदायिक सवालों से जूझती है। समालोचन में राकेश बिहारी ने इसे कथाहीन कहानी कहा है। मैं इससे आगे बढ़कर कहना चाहता हूँ कि यह कहानी वास्तव में कहानी न होकर एक ऐसा विमर्श है जिसमे कहानी की छौंक लगाने का असफल प्रयास किया गया है। गज- ग्राह कथा, पंचतंत्र की कहानियों, नचिकेता, ईसा मसीह, इब्ने सिन्ना इज्तिहादी, वाल्तेयर, लाओत्से, एलिस इन वंडरलैंड के सन्दर्भ के बहाने वे पाठकों को जिस सम्मोहनकारी दुनिया में ले जाना चाहते हैं, वास्तव में वे उसे वहां तक नहीं ले जा पाते और पाठक यह जान पाने में असमर्थ रहता है कि 'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है'। विवरणों की बहु...

बुद्ध की ज़रूरत आज भी है

गौतम बुद्ध विश्व के एकमात्र ऐसे महामानव थे, जिन्होंने पीडि़त मानवता को कष्टों से मुक्ति का राह दिखाई। उन्होंने मनुष्यत्व को प्रतिष्ठा प्रदान करते हुए मानवता को दुःखों से निवृत्ति हेतु अष्टांग मार्ग का सन्देश दिया। इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए बुद्ध जिस प्रक्रिया से होकर गुजरे थे, उसका विश्लेषण करते हुए श्रीलंकाई बौद्ध धम्मदासी भिक्खु केनेथ बी. गुणतुंगे अपनी पुस्तक ‘ह्वाट इज़़ रियलिटी’ में लिखते हैं-“आज से 2500 साल पहले युवा सिद्धार्थ उस मृत्यु की तलाश में अकेले ही निकल पड़े, जो उस समय तक अनजानी, अनसुनी और अज्ञात विचारधारा थी, जिसके रहस्यों से उस समय तक परदा भी नहीं उठा था। सिद्धार्थ मृत्यु से मुक्ति को उसकी सम्पूर्णता में प्राप्त करना चाहते थे। इसे हासिल करने के लिए वे स्वर्गीय वैभव तथा ऐश्वर्यशाली जीवन को भी ठुकरा चुके थे। एक शान्त मस्तिष्क को हासिल करने के लिए राजकुमार सिद्धार्थ को छह इन्द्रियों- नेत्र, कान, जिह्वा, शरीर और स्वयं मस्तिष्क को नियंत्रित करना पड़ा। इसके परिणामस्वरूप इन छह इन्द्रियों के माध्यम से आने वाली समस्त संवेदनाएँ रुक गयीं। यद्यपि उस समय छह इन्द्रियों द्वारा क...

मोहल्ल्ला अस्सी पर विवाद बेवजह

मोहल्ला अस्सी की रिलीज़ पर दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट द्वारा अगले आदेशों तक रोक लगा दिए जाने से एक बार पुनः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं के आहत होने का सवाल सतह पर आ गया है. अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब फ्रेंच कार्टून पत्रिका पर आतंकवादियों ने हमला बोल दिया था और धार्मिक भावनाओं के आहत होने के नाम पर अनेक लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया था. सलमान रश्दी, तसलीमा नसरीन, एम् ऍफ़ हुसैन, नरेंद्र मोहन आदि अनेक लेखक साहित्यकार फ़िल्मकार धर्म के आखेट होकर अपनी कृतियों पर पाबंदी लगवाने या फतवे जारी होने पर छुपकर रहने या देश निकाला का दंश सहने को विवश हुए हैं.      आश्चर्य की बात है कि इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक बीत जाने के बाद भी यह धार्मिक भावनाओं के आहत होने के नाम पर अपनी रोटियां सेंकने का यह कार्य बदस्तूर जारी है. चाहे ईश निंदा और काफिरों के विरोध के नाम पर इस्लामिक देशों में हो रहा आइसिस का खूनी खेल हो या एक फिल्म के छोटे से दृश्य में कही गयी छोटी सी बात का विरोध हो, इनमें भला अंतर क्या रह जाता है ? अंतर है तो इतना कि वहां यह खेल खूनी है तो यहाँ यह मानस...

मेरी प्रकाशित पुस्तक "वेदबुक से फेसबुक तक स्त्री" का अंश

यह लेख मेरी  प्रकाशित  पुस्तक "वेदबुक से फेसबुक तक स्त्री" का अंश है. कृपया पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया से उपकृत करें. वैदिक काल में सर्वत्र पत्नी को सम्मान प्राप्त नहीं था। वेदों में ऐसे अनेक प्रसंग आए हैं, जिनसे पति की पत्नी के प्रति हेय दृष्टि का आभास मिलता है। स्त्रियों के विष में ऋग्वेद में जो विवरण आए हैं,‘‘उनके अनुसार स्त्री का मन चंचल होता है, उसे नियंत्रण में रखना असम्भव सा है।1 उसकी बुद्धि भी छोटी होती है।2 वह अपवित्र होती है और उसका हृदय भेड़िये सा होता है।3 यदि विवाह के पश्चात् वधू के घर अपने पर परिवार के किसी सदस्य को, यहां तक कि मवेशियों को भी कुछ हो जाता था, तो उसका दोष आज की भांति ही नववधू के सिर मढ़ दिया जाता था। इस सन्दर्भ में इन्द्राणी और कृषाकपि का प्रसंग4 अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इन्द्र की अनुपस्थिति में वृक्षाकपि ने इन्द्राणी का शील भंग करने का प्रयास किया, जिसे इन्द्राणी में प्रयत्नपूर्वक असफल कर दिया। इन्द्र के आने पर इन्दाणी ने इन्द्र से वृक्षाकपि की शिकायत की, तो इन्द्र ने वृषाकपि पर क्रोध नहीं करते हुए अपितु यह कहकर वे इन्द्राणी को शान्त कर देते...

'मलाई'

Geeta Shree हमारे समय की महत्त्वपूर्ण लेखिका हैं। उनकी नवीनतम कहानी 'मलाई' एक लड़की की मलाई खाने के प्रति आसक्ति, गोरी होने की लालसा के अन्तर्संघर्ष के बीच झूलते हुए स्त्री विमर्श के कुछ नुकीले सवालों से सामना कराती है। इस कहानी में माँ- पिता और भाई का सुरीली के प्रति अतिशय संरक्षणवादी रवैया मध्यमवर्गीय परिवारों की हक़ीक़त है। भाई और पिता को मलाईदार दूध लेते देखना और खुद को इससे वंचित पाना एक बेहद सामान्य सी दिखने वाली पारिवारिक घटना है जिसे गीताश्री उसकी पूरी बुर्जुआवादी छवि के  साथ वे कहानी में पेश कर देती हैं। फेयर एण्ड लवली बनाम मलाई के द्वंद्व में फंसकर सुरिलिया मलाई को चेहरे पर गोरी होने हेतु लगाने से बेहतर अपनी चिरदमित यूटोपियाई चाह कटोरी भर मलाई खाने से पूरी करती है। यह एक लड़की का घर की चौखट पर बैठकर पेट भर मलाई खाना नहीं है अपितु इसके बहाने लेखिका पुरुष वर्चस्व के हथियारों पर अपने तरीके से चोट करती है। यहाँ तक कि नायिका की माँ और इधर की उधर लगाने वाली शीला दाई भी इस दिग्विजयी कार्य में कहीं न कहीं अपनी जीत का भी अनुभव करती है। ऐसे में मलाई सिर्फ दूध की मोटी परत भर न रहकर...

मेरी समस्या

मेरी समस्या मेरी समस्या यह है कि जब कांग्रेसी नीतियों की आलोचना करता हूँ तो कांग्रेसी मित्र नाराज़ हो जाते हैं, भाजपा की आलोचना पर दक्षिणपंथी मित्रों को बुरा लगता है और वामपन्थ की आलोचना करने पर तो नामवरी मित्र मेरे पीछे ही पड़ जाते है। लेकिन मैंने हमेशा यह प्रयास किया है कि मैं विचारधाराओं की बेड़ियों से मुक्त रहकर अपनी बात कहूँ। इसमें समर्थक भले ही कम मिलें लेकिन इस बात का संतोष तो रहता ही है कि मैंने निष्पक्ष होकर स्वविवेक से लिखा है और जो भी लिखा है उसके लिए मन में कोई अपराधबोध नहीं है।

आपातकाल के 40 बरस

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यूँ तो पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने सन 1962 में चीन से युद्ध के समय तथा इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय भी आपातकाल लगाया था किन्तु इन दो आपातकालों की वैधता पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जाता क्योंकि उस समय आपातकाल लगाया जाना आवश्यक था क्योंकि देश बाहरी दुश्मन से युद्ध लड़ रहा था लेकिन 25-26 जून की मध्य रात्रि को तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे और अपने बिगड़ैल पुत् र संजय गांधी के कहने पर अपनी कुर्सी बचाने के लिए जो आपातकाल देशवासियों पर थोपा उसके लिए देश उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा। दरअसल यह आपातकाल इसलिए लगाया गया था क्योंकि इलाहबाद  उच्च न्यायालय के निर्भीक और निष्पक्ष न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध रायबरेली से चुनाव लड़े राजनारायण की याचिका पर फैसला देते हुए इंदिरा गांधी को चुनाव में हेराफेरी का दोषी पाया और उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी। इसके बाद उच्चतम न्यायालय में भी न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर ने इस सजा को बरकरार रखा। इंदिरा ने इसके खिलाफ उच्चत...