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भारत सरकार की सराहनीय पहल

 कई बार भारत सरकार की श्रेष्ठ पहल का उतना प्रचार प्रसार नहीं हो पाता और बेहतरीन कदम प्रायः लोगों की नज़रों से दूर रह जाते हैं। मुझे भी दो दिन पहले ज्ञात हुआ कि अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने अनुवादिनी नाम का कृत्रिम बुद्धिमत्ता से युक्त अनुवाद टूल विकसित किया है, जिसमें लिखित या मुद्रित शब्दों, चित्रों या बोलकर कही गई बात का बड़ी आसानी से  कुल 22 भारत की क्षेत्रीय भाषाओं तथा विदेशी भाषाओं में परस्पर अनुवाद किया जा सकता है तथा इन्हें संपादित और संशोधित किया जा सकता है। इसमें बीस पृष्ठों को एक बार में स्रोत भाषा से लक्ष्य भाषा में अनूदित करने की सुविधा उपलब्ध है। इससे अधिक अनुवाद करने हेतु अनुमति की आवश्यकता होगी। भारत सरकार के इस महत्त्वपूर्ण कदम से विभिन्न भारतीय एवं विदेशी भाषाओं के साहित्य, संस्कृति और ज्ञान कोष को एक दूसरे से जोड़ने में सहायता मिलेगी, राष्ट्रीय एकता प्रगाढ़ होगी, वैश्विक धरातल पर भारतीय ज्ञान का प्रवाह सुगम होगा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप विभिन्न भाषाओं में लेखन सुगम होगा, वसुधैव कुटुंबकम् की भावना साकार होगी और हम जैसे लेखकों को विभिन्न भाषाओं का...

सर्वोच्च बलिदान के अप्रतिम शिखर लाला हरदौल की पावन जीवन गाथा है ‘लाला हरदौल’

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 विख्यात फिल्म निर्देशक और लेखक भाई हेमंत वर्मा ने बुंदेलखंड के लोक देवता वीरवर हरदौल के पावन जीवन चरित्र को केंद्र में रखते हुए लाला हरदौल शीर्षक से उपन्यास लिखा है, जो प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। बेहद जीवंत, प्रभावशाली भाषा शैली से सज्जित इस उपन्यास को यदि आप एक बार पढ़ना शुरू करेंगे तो इसमें डूब जाने की गारंटी है। गत वर्ष इसकी जो भूमिका लिखी थी, उसका अविरल रूप हेमंत जी को पुनः बधाई के साथ आप सबके समक्ष प्रस्तुत है - सर्वोच्च बलिदान के अप्रतिम शिखर लाला हरदौल की पावन जीवन गाथा है ‘लाला हरदौल’हि साहित्य मनुष्यता के विविध स्वरूपों के प्रेक्षण की प्रयोगशाला है और जब इसमें ऐतिहासिक घटनाओं का समाहार हो जाता है तो यह अतीत के प्रेरक व्यक्तित्वों के चरित्रांकन के माध्यम से वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए सबक देने तथा उन व्यक्तित्वों से प्रेरणा प्राप्त करने का सशक्त माध्यम बन जाता है. हिन्दी साहित्यकाश में ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण लेखक उपन्यासकार हुए हैं, जिन्होंने अतीत के गौरव गान के द्वारा साहित्य कोश की श्रीवृद्धि करते हुए अनेक प्रेरक व्यक्तियों महापुरुषों की गाथाओं क...

ते जड़जीव निजात्मक घाती, जिन्हहिं न रघुपति कथा सोहाती

 कवित विवेक एक नहिं मोरे, सत्य कहहुँ लिख कागद कोरे। उक्त पंक्तियां लिखने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी को उनके नालायक परवर्ती जिस प्रकार संबोधित कर रहे हैं, उससे दुःख होता है। कवि युगदृष्टा होता है और अपने युग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सर्जना करता है। अगर उसे 500 साल बाद का समाज अपने दौर की कसौटी पर कसना चाहेगा तो तुलसी ही नहीं नाथ, सिद्ध, जगनिक, चंदबरदाई, कबीर, सूर, केशव, बिहारी, यहां तक कि भारतेंदु, निराला प्रभृति प्रायः सभी कवि काल बाह्य हो जाएंगे।  तनिक हम तुलसी युगीन परिस्थितियों को देखें कि वे कौन से हालात थे, जिनमें विपरीत सामाजिक परिस्थितियों, अपने प्रति हुए घोर अत्याचारों के बाद भी वे सामाजिक एक्य के लिए कार्य करते हैं। श्रीराम की लीलाओं के मंचन के माध्यम से समाज को जोड़ते हैं, ऐसे राम राज्य की संकल्पना करते हैं, जिसमें स्त्री, पुरुष, दलित, दमित कोई भी अबुध या लक्षणहीन न हो। वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की पुनीत कथा भगवान शिव से पार्वती को सुनवाते हैं और इस प्रकार शैव, शाक्त और वैष्णव को एक कर देते हैं। उनकी कथा वास्तव में वह है जिसे काकभुशुण्डि जी ने गरुड़ को ...

कलात्मक फिल्म है कला

 जिस दौर की फिल्मों में रंगों को बेशर्म बताया जा रहा हो, केवल अश्लीलता सफलता की कसौटी बनाई जा रही हो, पाश्चात्य संस्कृति के प्रति अंध अनुराग प्रदर्शित किया जा रहा हो, भारतीय शास्त्रीय संगीत कोमा में जा चुका हो, ओटीटी प्लेटफार्म अश्लीलता के संवाहक बनकर सामने आ रहे हों, तब नेटफ्लिक्स पर प्रदर्शित अन्विता दत्त की फिल्म कला कला के प्रति आशा जगाती है और बताती है कि भारत का सिनेमा भारतीयता और सुरीलेपन को नहीं भुला सकता। कला फिल्म की कहानी आज़ादी से लगभग 10 वर्ष पूर्व की है, जिसमें स्त्री विमर्श की छौंक है, फिल्म जगत की क्रूर सच्चाइयां हैं, मां का सगी बेटी के प्रति अन्याय है, बेटी का सफलता प्राप्त करने के लिए किया गया वह कार्य है, जिसके लिए वह कभी खुद को माफ़ नहीं कर पाती। फिल्म के अनेक गीत रागों पर आधारित हैं, जो गर्म तपती हवा के बीच शीतल मन्द सुगंधित बयार की भांति हैं। बलमा घोड़े पे क्यों सवार है, फेरो न नज़रिया, बिखरने का मुझको शौक है बड़ा जैसे गीत बेहद खूबसूरत हैं और कबीर का निर्गुण उड़ जाएगा हंस अकेला तो कहानी से ऐसा घुल मिल गया है कि ऐसा लगता है मानो इस फिल्म के लिए ही लिखा गया हो। ...

हिंदी विरोध के नाम पर देशद्रोह बर्दाश्त नहीं है

 लगता है कि जहां जहां खुराफात होगी, वहां वहां श्रीमान कपिल सिब्बल महाशय अवश्य मौजूद होंगे। कल चेन्नई की थाउसैंड लाइट्स विधानसभा के डीएमके विधायक और आरम सैय विरुंबु ट्रस्ट  के प्रतिनिधि एशिलन नागनाथन की ओर से एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें शिक्षा और स्वास्थ्य को केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की समवर्ती सूची से हटाकर राज्यों की सूची में शामिल करने का अनुरोध किया गया है। वादियों, जिनमें परदे के पीछे से तमिलनाडु सरकार भी शामिल है और तमिलनाडु सरकार की ओर से सिब्बल महाशय का तर्क है कि आपातकाल के दौरान सन 1976 में उनकी ही पार्टी की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा किए गए 42वें संविधान संशोधन से पहले ये दोनों विषय राज्य की सूची में थे। उनका कहना है कि केंद्र को सिर्फ इन विषयों पर सहयोग करना चाहिए और भाषा, सेहत गुणवत्ता आदि विषय राज्यों पर ही छोड़ देने चाहिए। तमिलनाडु की धरती से हिंदी विरोध की यह प्रच्छन्न साजिश अत्यंत गंभीर है क्योंकि हिंदी के विरुद्ध खड़े होने के साथ साथ ये लोग देश की शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य के साथ भी भयंकर खिलवाड़ करके अपनी राजनीति को चमकाना चाह...

मेरी पुस्तक प्राथमिक चिकित्सा और स्वास्थ्य का अंश

 प्राथमिक चिकित्सा का प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में अत्यधिक महत्व है किंतु प्रायः इसके लिए जागरूक करने के प्रयास नहीं किए जाते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के स्नातक द्वितीय सेमेस्टर के मूल्य आधारित पाठ्यक्रम में इसे रखा है। यह बेहद ज़रूरी है कि हम विभिन्न आपातकालीन स्थितियों में प्राथमिक चिकित्सा के माध्यम से रोगी की जान को बचा सकें। मैंने डॉ वीरेंद्र सिंह यादव और डॉ यतेंद्र सिंह कुशवाहा के साथ मिलकर यह पुस्तक लिखी है, जिसे प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली ने  बिल्कुल अभी अभी बेहद सुरुचिपूर्ण तथा खूबसूरती से प्रकाशित किया है। यह पाठ्यक्रम के साथ साथ आम आदमी के लिए भी आवश्यक पुस्तक है, जो ऑनलाइन तथा ऑफलाइन उपलब्ध है। लीप्रस्तुत है इस पुस्तक की अनुक्रमणिका और कुछ प्रारंभिक अंश - अनुक्रम  इकाई-1 आधारभूत प्राथमिक चिकित्सा प्राथमिक चिकित्सा का उद्देश्य प्राथमिक चिकित्सा के सिद्धांत  आपातकालीन स्थिति से निपटना, पुनर्जीवन (आधारभूत सी.पी.आर)  सी.पी.आर.देने की प्रक्रिया रिकवरी या स्वास्थ्य लाभ स्थिति में लाने के उपाय, प्रारंभिक आपादमस्तक मूल्यांकन  हाथ ...

सियाराम शरण गुप्त जी को जयंती पर पुण्य स्मरण

 जब मैं छोटा बालक हुआ करता था, उस समय मेरी बड़ी बहन हम सब के थे प्यारे बापू का सस्वर पाठ किया करती थीं। उस समय यह कविता संभवतः उत्तर प्रदेश सरकार के कक्षा 8 के हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल थी। तभी यह कविता मुझे भी कंठस्थ हो गई थी और तब यह नहीं पता था कि इसके सर्जक राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी के अनुज और प्रख्यात गांधीवादी कवि, कहानीकार, निबंधकार सियारामशरण गुप्त जी हैं। बाद में गुप्त जी को पढ़ने के बाद ज्ञात हुआ कि गांधीवाद ही नहीं वरन् काकी कहानी के द्वारा बाल मनोविज्ञान, जय हिन्द काव्य संग्रह द्वारा देशभक्ति का प्रयाण गीत, देश प्रेम की कविताएं, अनेक कविताओं द्वारा आत्मालाप, विनय गीत, पुत्री रमा की मृत्यु के पश्चात आर्द्रा काव्य के माध्यम से शोक गीत, विश्व शांति, गोद, अंतिम आकांक्षा और नारी उपन्यासों तथा मानुषी लघु कथा कृति के माध्यम से स्त्री मनोविज्ञान की गहरी परख की है। आज पूज्य सियाराम शरण गुप्त जी की 128वीं जयंती पर सुबह आठ बजे उनके पौत्र प्रमोद गुप्त जी, साहित्यकार निहाल चन्द्र शिवहरे, साकेत सुमन चतुर्वेदी जी तथा शहर के गणमान्य नागरिकों एवं अन्य साहित्यकारों के साथ पूज्य सिया...

द कश्मीर फाइल्स में सेल्फ डिस्ट्रक्टिव स्पिसीज भी होने चाहिए थे

 हम भारतवासी, जिनमें से निन्यानबे प्रतिशत लोग कश्मीरी भाषा का क भी नहीं समझते, वे कश्मीरी फाइल्स के कश्मीरी बोलों को देख सुनकर न सिर्फ़ उस दर्द को महसूस कर पा रहे हैं, जिसे कश्मीरी पंडितों ने झेला और अपने ही देश में शरणार्थी बनकर दर दर की ठोकरें खाने को विवश हुए, बल्कि उस नारे रलीव, जलीव, गलीव को भी समझा जो मजहबी कट्टरता का प्रतीक बनकर जन्नत जैसे कश्मीर को दोजख में झोंक देने का प्रतीक बन गया।  जिस समय यह नृशंस नरसंहार हो रहा था, उस समय मैं किशोरावस्था में ही था और कश्मीर की वास्तविक सच्चाइयों को उस समय मीडिया ने छुपाकर रखा था, फिर भी जो घटनाएं छन छन कर आती थीं, उनसे सिर्फ अंदाज़ भर लग पाता था कि कश्मीर किस तरह जल रहा है। टीकालाल टपलू, बालकृष्ण गंजू, गिरिजा टिक्कू, न्यायमूर्ति नीलकंठ गंजू और भी न जाने कितने निर्दोष उस वहशियाना मानसिकता की भेंट चढ़ा दिए गए जो मजहबी आधार को मनुष्यता से बहुत आगे रखती है। आज पुनः द कश्मीर फाइल्स देखने के बाद कुछ विचार मन में आ रहे हैं। पहला यह कि इस फिल्म के बाद तथाकथित बॉलीवुड को अब बच्चन पांडे, मैं हूं न जैसी फॉर्मूला फ़िल्मों और सलीम जावेद टाइप ...

हम सबकी आत्मसत्ता का प्रतीक है गणतंत्र दिवस

 गणतन्त्र वस्तुतः हम सबकी आत्मसत्ता का प्रतीक है। 15 अगस्त 1947 ने हमें आज़ादी तो दे दी थी, किन्तु उस समय तक न तो हमारे पास अपना कोई संविधान था, न ही हम अपने आपको इस योग्य बना सके थे कि हम खुदमुख्तार बन सकें। यही कारण था कि आजादी के बाद भी लगभग 3 साल तक हमने गवर्नर जनरल के पद को बनाए रखा औऱ  अंग्रेज़ो द्वारा नियुक्त लार्ड माउंटबैटन तथा उसके बाद चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को गवर्नर जनरल बनाया। साथ ही डॉ राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान सभा ने भारत का संविधान बनाने का कार्य भी फौरन शुरू कर दिया, जिसकी प्रारूप समिति का अध्यक्ष डॉ बाबा साहब भीमराव रामजी आम्बेडकर को बनाया गया। संविधान 26 नवम्बर सन 1949 को बनकर तैयार हुआ लेकिन इसे 26 जनवरी 1950 से लागू इसलिए किया गया क्योंकि आज़ादी से पहले देश 26 जनवरी को ही अपना स्वतन्त्रता दिवस मनाता था क्योंकि 26 जनवरी सन 1930 को लाहौर में रावी नदी के तट पर पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्रता का उद्घोष किया था। आज के दिन से हमने अंग्रेज़ों के बनाए संविधान तथा राज्य व्यवस्था को त्यागकर अपनी व्यवस्था स्थापित की लेकिन दुर्भाग्य यह कि हम अंग्रेज़ियत...

आओ मनाएं राष्ट्रीय मतदाता दिवस

 आज ग्यारहवाँ राष्ट्रीय मतदाता जागरूकता दिवस है। आज से 13 वर्ष पूर्व कैप्टन सुभाष चन्द्र नामक एक आम मतदाता ने भारत निर्वाचन आयोग से अनुरोध किया था कि आयोग को मतदाता दिवस भी मनाना चाहिए। इसका संज्ञान लेते हुए आयोग ने 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता जागरूकता दिवस घोषित किया क्योंकि इसी दिन 25 जनवरी, 1950 को भारत के गणतन्त्र घोषित होने से एक दिन पहले ही भारत निर्वाचन आयोग का गठन किया गया था।  अपनी स्थापना के दिवस को ही यादगार बनाते हुए आयोग ने 25 जनवरी को ही मतदाता जागरूकता अभियान के लिये चुना। 25 जनवरी 2011से प्रति वर्ष राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है। राष्ट्रीय मतदाता दिवस 2022 का ध्येय वाक्य 'मजबूत लोकतंत्र के लिए चुनावी साक्षरता' है। लोकतंत्र के पावन पर्व राष्ट्रीय मतदाता दिवस के अवसर पर आइये संकल्प लें कि हम जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र, प्रलोभन आदि से मुक्त होकर अनिवार्य रूप से मतदान करेंगे और सर्वश्रेष्ठ प्रत्याशी को चुनकर राष्ट्रीय हित के इस महत्त्वपूर्ण आयोजन में अपनी भूमिका का अवश्य निर्वाह करेंगे। आज के दिन प्रातः 11 बजे हम जो शपथ लेंगे, आशा है कि पांच प्रदेशों में होने व...